घोर कलियुग ? जी नही

*घोर कलियुग ?* 
जब दोस्तोंसे मानवता की दास्तां होती है तो कुछ फ्रेंड्स कहते है कि घोर कलियुग है इसलिए कुछ नही होनेवाला ।। 
लेकिन मेरा अध्ययन तो कुछ और ही बताता है । मानवीय व्यवहार को देखें तो *हिंसा का बड़ा प्रभाव* रहा है इतिहास काल से । रोमन, यूरोपियन, अरेबिक साम्राज्यवाद, semetic war ये कुछ उदाहरण मात्र है । इसके अलावा अंतर राज्यीय युद्ध भी होते थे जैसे फ्रांस और इंग्लैंड हो या अशोक का कलिंग संहार हो । 
इन सबमे अपनी राज्य या धर्म सत्ता को स्थापित करनेका इरादा प्रभावी रहता था । युद्ध कहे तो उसके साथ  *हिंसा, बलात्कार, शोषण, deceiving* ये बाते भी आती ही है । 
इस बारेमे हम गत 70 सालोंसे निश्चित रूप से आगे बढ़े है । 
और भी मुद्दे है जिनके बारेमे मानव सुधार हो रहा है । जैसे *स्त्री के प्रति समानता का दृष्टिकोन* , slavery प्रथा का खात्मा होना, *लोकशाही* स्थापित होना, अंधश्रद्धा का विरोध करना, अस्पृश्यता नष्ट होना आदि रूप में हम थोड़े और अच्छे इंसान बन गये है । नही ? 
इसलिए कहता हूँ और आगे बढ़ने की पूरी  संभावना है ही है । *कोशिश तो करे ?*

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